“आस” A poem by Mrs. Renu Shahanawaz Hussain

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 written by: Mrs. Renu Shahanawz Husaain

आस

बसंत के जाने के बाद और 

पतझर के आने से पहले                                                          एक  कविता मशहूर कवयित्री श्रीमती रेणु शाहनवाज़ हुसैन की कलम से

कुछ पत्ते वहीं ठहरे रहते हैं 

 कंपकंपाते

शाख़ों को नहीं छोड़ते वो
उम्मीद की धूल ओढ़े
खड़े रहते हैं                                                                


वो पत्ते ना तो नए होते हैं
न इतने बूढ़े कि आस छोड़ दें
इन पत्तों का
सौंदर्य से कोई सरोकार नहीं रह जाता
साँस घुटने लगती है 


फूलों की तीखी गंध से इनकी
सूखी हवा के चरमराते क़दमों से भी
कोई वास्ता नहीं रह जाता
ये पत्ते बँधे रहते हैं जड़ों से 


इनकी धमनियों में बहता रहता है
टहनियों का ख़ून और पसीना
तुम्हारे आने से पहले और
चले जाने के बाद का
ये अंतराल भी 


बहुत नाज़ुक होता है 
वक़्त की तेज़ हवाओं के बाद भी 
मगर 
जीने की आस है 
कि ज़िंदा रहती है …

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